बरसों से उम्मती बन न सका!

हम सब प्यारे नबी (स.) की उम्मत हैं। आप (स.) की तालीम हमारी विरासत है। उनकी ज़िंदगी में हमारे लिए बेहतरीन नमूना है। उनके उम्मती होने के सबब से हमें आप (स.) की तालीम पर अमल करना है, उनके दिखाए हुए रास्ते पर चलना है। आपकी जिंदगी का हर पहलू रहमत से लबरेज़ है। लेकिन कितने दुःख की बात है कि, आज उनके मानने वालों के बीच, उनके उम्मती होने का दावा करने वालों के बीच हमें रहमत का मंज़र देखने को नहीं मिलता।

ऐसा क्यों हुआ?

क्योंकि आज हम अपनी ज़बान से तो अपने आप को प्यारे नबी (स.) का उम्मती कहते हैं लेकिन अपने किरदार में, अपने आमाल में उनकी दी हुई किसी भी सीख को नहीं अपनाते हैं।

आज के मुसलमान, प्यारे नबी (स.) की उम्मत का तर्ज़े-अमल कुछ इस तरह है:-

औरत की इज़्ज़त करना था, उनसे बेहतरीन सुलोक़ करना था।

उनके लिए हक़-ए-महर और विरासत में हिस्सा रखा था।

दहेज़ तो तूने मांग लिया, हक़-ए-महर अदा कर न सका।

मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन सका!

ज़ुल्म-ओ-सितम और गाली-गलौज से तुम को रोका था।

निकाह एक मुहाइदा है, जिसमें दोनों का बराबरी  का दर्जा था।

‘क़ुबूल है’ इक रस्म बना लिया, औरत की रज़ा तू पूछ भी न सका।

‘क़ुबूल है’ इक रस्म बना लिया, औरत की रज़ा तू पूछ भी न सका।

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मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन न सका!

वादों को वफ़ा करना था, हक़ पर क़ायम रहना था।

वक़्ती नफ़े के ख़ातिर, झूठ से तुमको बचना था।

झूठ, ख़यानत में ऐसा डूबा, तू क़ौल पर अपने टिक न सका।

मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन सका!

ख़ुद अपने ख़िलाफ़ हो चाहे, ग़वाही सच्ची देना था।

रिश्ते-नाते के चक्कर में भेद-भाव से तुमको टोका था।

बातिल के अंधेरों में ऐसा खोया तू, अदल पर क़ायम रह न सका।

मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन सका!

तंज़ कसने, मज़ाक़ उड़ाने और ग़ीबत से तुमको रोका था।

तक़ब्बुर और अनापरसती को बदतरीन अमल बताया था।

अना और गुरूर का रंग चढ़ाकर, इंकिसारी से तू रह न सका।

मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन सका!

माफ़ करने, दर-गुज़र करने का हुक़्म नबी (स.) ने दिया था।

मुस्कुरा कर टाल देना, बुराई के बदले भलाई करना था।

झूठी शोहरत की ख़ातिर, नबी (स.) की सीख पर अमल कर न सका।

मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन सका!

आइए हम सब अपने आप से ये अहद करते हैं कि हम अपनी ज़िन्दगियों में अपने नबी (स.) की तालीम को उतारेंगे, अपने आमाल को सुधारेंगे। अगर हमें उम्मती होने का हक़ अदा करना है तो हमें  आपकी हर सीख को अपने अख़्लाक़ में लाना होगा।

आज हमारे नबी (स.) पर दुनिया ने जो भी इल्ज़ाम लगाए हैं, उनको मिटाने का यही तरीक़ा है कि हम अपने आमाल से लोगों पर हक़ को साबित करें।

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